भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय और अरुणाचल प्रदेश सरकार के साथ मिलकर अंतरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ की ओर से आज अरुणाचल प्रदेश के तवांग में 'सेक्रेड रेलिक्स एक्सपोजिशन (पवित्र अवशेष (निशानी) प्रदर्शनी)' के दौरान तवांग के कलावांगपो कन्वेंशन सेंटर में एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया। इस सम्मेलन का विषय था - 'बौद्ध धर्म: हिमालयी क्षेत्र और उससे आगे प्रसार।'

इस सम्मेलन में भारत, नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार, मलेशिया, इंडोनेशिया और जर्मनी के बौद्ध भिक्षुओं, विद्वानों और प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

उद्घाटन सत्र की शुरुआत संघ के सम्मानित सदस्यों द्वारा मंगलाचरण (पवित्र मंत्रोच्चार) से हुई। इसके बाद आईबीसी के महासचिव शार्टसे खेनसुर जंगचुप चोडेन रिम्पोछे ने स्वागत भाषण दिया। सभा को संबोधित करते हुए आईबीसी के महासचिव ने इस सम्मेलन के विषय पर प्रकाश डाला, जो इस बात की पड़ताल करता है कि भारत के मैदानी इलाकों में बौद्ध धर्म का उदय कैसे हुआ और यह पूरे उपमहाद्वीप तथा उसके बाहर कैसे फैला। उन्होंने अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री का आभार व्यक्त किया कि वे मुख्य अतिथि के रूप में इस कार्यक्रम में शामिल हुए। महासचिव ने सम्मेलन आयोजित करने में मिले सहयोग के लिए अरुणाचल प्रदेश प्रशासन और भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय का भी आभार व्यक्त किया।

आईबीसी के महासचिव ने बताया कि यह अवसर विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इसी दिन आईबीसी का 14वां स्थापना दिवस भी है। इस दौरान आईबीसी ने निरंतर बुद्ध धम्म की सेवा की है। उन्होंने बताया कि आईबीसी दुनिया भर के बौद्ध भिक्षु-संघों और आम बौद्ध संगठनों को एकजुट करने के लिए प्रतिबद्ध है। साथ ही उन्होंने उम्मीद जताई कि आईबीसी भविष्य में 'अरुणाचल बौद्ध परिसंघ' (एबीसी) के साथ मिलकर 'बुद्ध धम्म' की सेवा के लिए काम करेगा।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री पेमा खांडू ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए आईबीसी को उसके 14वें स्थापना दिवस पर बधाई दी। उन्होंने इसे एक सुखद संयोग बताया कि तवांग में आयोजित 'बौद्ध धर्म पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन' और आईबीसी की 14 वर्षों की शानदार सेवा का समय एक साथ पड़ रहा है। उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रति आईबीसी के वर्तमान और पहले के मार्गदर्शकों के समर्पण और प्रतिबद्धता के लिए उनके प्रयासों की सराहना की।

मुख्यमंत्री ने कहा कि आईबीसी, भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय और अरुणाचल प्रदेश सरकार द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित यह सम्मेलन तवांग में पवित्र अवशेषों की उपस्थिति के कारण विशेष महत्व रखता है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में हुई चर्चाओं के मुख्य विषयों और उप-विषयों पर ध्यान दिया और याद किया कि कैसे भारत में शुरू हुआ बौद्ध धर्म, तीसरी सदी ईसा पूर्व में सम्राट अशोक के प्रयासों से आगे फैला। उन्होंने विस्तार से बताया कि कैसे छठी-सातवीं सदी ईस्वी से बौद्ध धर्म भारत के हिमालयी क्षेत्र, विशेषकर अरुणाचल प्रदेश से फैलकर तिब्बत और अन्य क्षेत्रों तक पहुंचा। उन्होंने इसका श्रेय गुरु पद्मसंभव और शांत रक्षित को दिया। उन्होंने छठे दलाई लामा के जन्मस्थान के रूप में तवांग के महत्व पर भी प्रकाश डाला।

व्यापक बौद्ध विरासत में अरुणाचल प्रदेश के विशेष स्थान को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि यहां के मठ केवल पूजा-स्थल ही नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक धरोहर हैं। उन्होंने सांस्कृतिक मूल्यों को सुरक्षित रखते हुए विकास और आधुनिकता सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया और इस बात पर विचार करने को कहा कि बुद्ध के संदेश को आगे कैसे बढ़ाया जा सकता है।

उन्होंने पवित्र अवशेष (निशानी) प्रदर्शनी और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के लिए भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय, राष्ट्रीय संग्रहालय, आईबीसी और अरुणाचल प्रदेश प्रशासन को धन्यवाद देते हुए अपनी बात समाप्त की। उन्होंने सम्मेलन के प्रतिनिधियों, विशेष रूप से कई देशों से आए उन अंतरराष्ट्रीय वक्ताओं को भी धन्यवाद दिया, जो सम्मेलन में भाग लेने के लिए तवांग आए हैं।

दिन भर चले इस सम्मेलन में तीन विषयगत सत्र हुए। इनमें हिमालयी क्षेत्र और उसके बाहर बौद्ध धर्म के प्रसार, विकास और समकालीन प्रासंगिकता के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया गया।

सम्मेलन के पहले सत्र का विषय 'महापरिनिर्वाण के बाद बुद्ध की विरासत को आगे बढ़ाना' था। श्रीलंका, म्यांमार और भारत के वक्ताओं के एक पैनल ने महापरिनिर्वाण के बाद बुद्ध की स्थायी विरासत पर चर्चा की। इसमें भौतिक धरोहर के संरक्षण तथा अनुष्ठानों और संस्थागत नवीनीकरण के माध्यम से इस विरासत को आगे बढ़ाने के पहलुओं पर विचार किया गया। चर्चाओं में 'चार आर्य सत्यों' को एक जीवंत विरासत के रूप में देखा गया। साथ ही, बौद्ध धर्म के विकास को एक ऐसी मिली-जुली सांस्कृतिक परंपरा के रूप में समझा गया, जो विभिन्न संस्कृतियों के आदान-प्रदान, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और पीढ़ियों तथा समाजों के बीच धम्म के प्रसार से आकार लेती गई है।

सम्मेलन के दूसरे सत्र का विषय 'बौद्ध धर्म की ऐतिहासिक और सैद्धांतिक निरंतरता' था। इसमें नेपाल, जर्मनी और भारत के वक्ताओं ने विभिन्न ऐतिहासिक कालखंडों के दौरान बौद्ध ग्रंथों और मठ-परंपराओं के प्रसार का विश्लेषण किया। इसमें अरुणाचल प्रदेश पर विशेष रूप प्रकाश डाला गया। इसमें बौद्ध संप्रदायों की विविधता और उनके साझा सैद्धांतिक आधारों की पड़ताल की गई। साथ ही बौद्ध विचारों को संरक्षित करने और उन तक पहुंचाने में भाषा, व्याख्या, शिक्षण पद्धति और कलात्मक अभिव्यक्ति की भूमिकाओं पर प्रकाश डाला गया।

दिन का आखिरी सत्र बौद्ध धर्म और राइट लाइवलीहुड पर केंद्रित था। इसमें इंडोनेशिया, मलेशिया और भारत के वक्ताओं के एक पैनल ने आज के शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक संदर्भों में 'सही आजीविका' से जुड़े बौद्ध सिद्धांतों की प्रासंगिकता पर चर्चा की। इन चर्चाओं में नालंदा की बौद्धिक विरासत को आधुनिक शिक्षा-जगत से जोड़ा गया और बौद्ध दृष्टिकोण से सांस्कृतिक पर्यटन, तीर्थयात्रा, स्थायी समृद्धि, कौशल विकास, भौगोलिक जुड़ाव, तथा वैश्वीकरण और उपभोक्तावाद के प्रभावों का विश्लेषण किया गया।

अरुणाचल प्रदेश सरकार के कार्मिक एवं आध्यात्मिक मामलों के विभाग (डीओकेएए) के निदेशक श्री थुप्तेन काल्डेन द्वारा धन्यवाद प्रस्ताव पेश किए जाने के साथ ही सम्मेलन संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम का समापन मोन्पा समूह द्वारा प्रस्तुत अतिश दीपंकर श्रीज्ञान की पवित्र 'दीप प्रार्थना' के साथ हुआ, जिसने सम्मेलन को एक गंभीर और आध्यात्मिक रूप से उत्थानकारी मोड़ पर समापन किया।