आज यहाँ भारत मंडपम में "इमर्जिंग साइंस, टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन कॉन्क्लेव" (ईएसटीआईसी), 2026 के समापन सत्र को संबोधित करते हुए केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), तथा प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने प्रौद्योगिकी के माध्यम से बदलाव का आह्वान किया। उन्होंने विकसित भारत 2047 के लिए स्पष्ट और तय लक्ष्यों पर काम करने के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के सुझाव को भी दोहराया।
वैज्ञानिक खोजों से आगे बढ़कर उनके व्यावहारिक अनुप्रयोग की आवश्यकता पर जोर देते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत के अनुसंधान और नवाचार इकोसिस्टम की सफलता का आकलन तेजी से राष्ट्रीय विकास और 'विकसित भारत 2047' के विजन में इसके ठोस योगदान के माध्यम से किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के परिणाम-केंद्रित विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विजन को आगे बढ़ाते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने देश की प्रगति का आकलन करने और इसकी दीर्घकालिक वैज्ञानिक एवं तकनीकी क्षमताओं को मजबूत करने के लिए अगले तीन वर्षों हेतु स्पष्ट और तय लक्ष्यों की पहचान करने के महत्व पर बल दिया।
समापन सत्र में भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार प्रोफेसर अजय के. सूद; वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग (डीएसआईआर) की सचिव तथा वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की महानिदेशक डॉ. (श्रीमती) एन. कलाईसेल्वी; जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) के सचिव डॉ. राजेश एस. गोखले; विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के सचिव प्रोफेसर उमेश वी. वाघमारे; पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (एमओईएस) के सचिव डॉ. श्रीनिवास कुमार तुम्माला और कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (डीएआरई) के सचिव तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक डॉ. मांगी लाल जाट के अलावा वैज्ञानिक, वरिष्ठ अधिकारी, उद्योग प्रतिनिधि, स्टार्ट-अप और अन्य हितधारक उपस्थित थे। इस सत्र में ईएसटीआईसी 2026 से निकले मुख्य सुझावों एवं सिफारिशों पर प्रस्तुतियां दी गईं, जिसके बाद दो ऐतिहासिक दस्तावेजों का विमोचन किया गया और केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह का समापन संबोधन हुआ।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि ईएसटीआईसी को धीरे-धीरे विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त वैज्ञानिक मंच के रूप में विकसित होना चाहिए, जहाँ शोधकर्ता, शिक्षाविद और इनोवेटर्स इसके वैज्ञानिक कार्यक्रम की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को दर्शाते हुए सक्रिय रूप से भाग लेने के अवसरों की तलाश करें। नोबेल पुरस्कार विजेताओं सहित वैज्ञानिक विषयों की एक विस्तृत श्रृंखला और अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों को एक साथ लाने के लिए आयोजकों की सराहना करते हुए, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत की अनुसंधान प्राथमिकताओं को देश के भीतर विकसित स्वदेशी संसाधनों, स्वदेशी पद्धतियों और प्रौद्योगिकियों पर अधिक से अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उन्होंने विज्ञान प्रशासन में क्षमता विकास को मजबूत करने के महत्व पर भी बल दिया, जिससे संस्थागत नेतृत्व की जिम्मेदारी संभालने वाले वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को वैज्ञानिक संगठनों को प्रभावी ढंग से मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए आवश्यक प्रबंधकीय और प्रशासनिक क्षमताओं को विकसित करने में सक्षम बनाया जा सके।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के उभरते क्षेत्र भारत की तकनीकी प्रगति को गति देने और इसके नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार लाने के अवसर प्रदान करते हैं। बायोटेक्नोलॉजी, जीनोमिक्स और अंतरिक्ष अनुसंधान में हो रहे विकास का उल्लेख करते हुए, उन्होंने स्पेस मेडिसिन सहित भविष्य की वैज्ञानिक आवश्यकताओं का पहले से अनुमान लगाने की आवश्यकता पर बल दिया, क्योंकि मानव अंतरिक्ष मिशन अधिक जटिल और दीर्घकालिक होते जा रहे हैं। उन्होंने न्यूक्लियर मेडिसिन सहित परमाणु विज्ञान और प्रौद्योगिकी के व्यापक अनुप्रयोगों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया और जोर देकर कहा कि इनकी क्षमता ऊर्जा और रणनीतिक अनुप्रयोगों से कहीं आगे बढ़कर स्वास्थ्य सेवा तथा अन्य सामाजिक जरूरतों तक फैली हुई है। डॉ. जितेंद्र सिंह ने भारत की भावी आर्थिक और भू-राजनीतिक स्थिति को आकार देने में महासागर विज्ञान और ब्लू इकोनॉमी के रणनीतिक महत्व पर भी बल दिया, साथ ही किफायती और सुलभ पोषण को एक राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाए रखने का आह्वान किया।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने समापन सत्र में स्टार्ट-अप पुरस्कार विजेताओं और प्रमाण पत्र प्राप्तकर्ताओं को भी बधाई दी। उद्घाटन दिवस के दौरान स्टार्ट-अप्स के साथ प्रधानमंत्री की बातचीत का उल्लेख करते हुए, उन्होंने शिक्षा जगत, अनुसंधान संस्थानों, उद्योग और उभरते उद्यमों के बीच अधिक गहन जुड़ाव की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि ईएसटीआईसी से निकले विचार-विमर्श और सिफारिशें अधिक एकीकृत नवाचार इकोसिस्टम के निर्माण में योगदान देंगी, जिसमें प्रौद्योगिकियों के विकास, उनके सुचारू उपयोग को बढ़ावा देने और 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्यों की ओर भारत की वैज्ञानिक क्षमताओं को आगे बढ़ाने पर अधिक जोर दिया जाएगा।
इससे पहले, प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार प्रोफेसर अजय के. सूद ने कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान का मुख्य उद्देश्य केवल खोजों तक सीमित न रहकर ऐसे समाधान विकसित करना होना चाहिए जो वास्तविक जीवन की चुनौतियों का समाधान कर सकें। उन्होंने सरकारी विभागों, विश्वविद्यालयों, उद्योग और स्थानीय समुदायों के बीच मजबूत सहयोग के साथ-साथ नवाचार के लिए अधिक प्रभावी सहायता प्रणालियों पर बल दिया। उन्होंने विभिन्न मंत्रालयों के आपसी सहयोग और होल-ऑफ-गवर्नमेंट दृष्टिकोण के माध्यम से तैयार किए गए दो ऐतिहासिक ज्ञान दस्तावेजों को भी प्रस्तुत किया।
ईएसटीआईसी 2026 के लिए नेशनल विजन डॉक्यूमेंट 'विकसित भारत 2047' के अनुरूप 12 विषयगत क्षेत्रों में 12 मंत्रालयों और विभागों की दीर्घकालिक विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार प्राथमिकताओं को एक साथ लाता है। 'इंडिया: साइंस, टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन आउटलुक 2026' भारत के विकसित हो रहे विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार इकोसिस्टम का एक व्यापक, साक्ष्य-आधारित विवरण प्रदान करता है, जिसमें नीति-निर्माण का समर्थन करने और अंतर्राष्ट्रीय साझेदारों के साथ जुड़ाव को मजबूत करने के लिए क्वांटिफिएबल जानकारी दी गई है। एसटीआई आउटलुक को एक परिवर्तनशील संसाधन के रूप में परिकल्पित किया गया है जिसे प्रतिवर्ष अपडेट किया जाएगा।
डीएसआईआर की सचिव और सीएसआईआर की महानिदेशक डॉ. (श्रीमती) एन. कलाईसेल्वी ने एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग पर हुए सत्र के प्रमुख निष्कर्षों को प्रस्तुत किया। चर्चाओं में भारतीय अर्थव्यवस्था में एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग के योगदान को बढ़ाने, सफल तकनीकों के विकास से लेकर उनके धरातल पर उतरने की प्रक्रिया को तेज करने तथा वैज्ञानिक एवं तकनीकी समाधानों को ग्रामीण और वंचित समुदायों तक पहुँचाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। प्रतिभागियों ने अनुसंधान प्रयोगशालाओं और उद्योग के बीच मजबूत सहयोग, शोधकर्ताओं और औद्योगिक साझेदारों के लिए साझा परफॉर्मेंस इंडिकेटर्स, उन्नत अनुप्रयोगों के लिए पारंपरिक सामग्रियों की अधिक खोज और विशेष विनिर्माण उपकरणों एवं तकनीकों में क्षमता विकास का आह्वान किया। इस सत्र में स्वदेशी अनुसंधान को ऐसे समाधानों में बदलने के महत्व पर भी बल दिया गया जो स्पष्ट आर्थिक और सामाजिक लाभ उत्पन्न करें।
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव ने महासागर विज्ञान और समुद्री प्रौद्योगिकियों पर आयोजित सत्र से निकले सुझावों और सिफारिशों की रूपरेखा प्रस्तुत की। चर्चाओं में उपग्रहों, अनुसंधान जहाजों, बोय (Buoys) और स्वायत्त प्लेटफार्मों के माध्यम से महासागर अवलोकन प्रणालियों को मजबूत करने का आह्वान किया गया, जिन्हें उन्नत मॉडलिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का समर्थन प्राप्त हो, ताकि वैज्ञानिक अवलोकनों को व्यावहारिक महासागरीय जानकारी में बदला जा सके। इस सत्र में समुद्री सुरक्षा, मौसम एवं जलवायु सेवाओं, तटीय संरक्षण, मत्स्य पालन और रणनीतिक समुद्री क्षमताओं में अनुसंधान एवं व्यावहारिक अनुप्रयोगों के बीच के अंतर को कम करने पर बल दिया गया। इसमें उद्योग के साथ मजबूत सहयोग, सुलभ डेटा प्रणालियों, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और समुद्री संसाधनों के सतत प्रबंधन के साथ-साथ अंडरवॉटर रोबोटिक्स, गहरे समुद्र की खोज, महासागरीय ऊर्जा और डीसेलिनेशन में स्वदेशी तकनीकों के व्यापक उपयोग का भी आह्वान किया गया। इन सिफारिशों ने तटीय समुदायों और ब्लू इकोनॉमी के सतत विकास को भारत की महासागर विज्ञान प्राथमिकताओं के केंद्र में रखा।
जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव ने सिस्टम्स और सिंथेटिक बायोलॉजी पर आयोजित सत्र के प्रमुख सुझावों और सिफारिशों को प्रस्तुत किया। चर्चाएँ जैविक अनुसंधान, प्रायोगिक डिजाइन और प्रेडिक्टिव कैपेबिलिटीज में सुधार के लिए सिस्टम्स बायोलॉजी, सिंथेटिक बायोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को एकीकृत करने पर केंद्रित थीं। प्रतिभागियों ने बायो-एआई हब, बायो-फाउंड्रीज और बायो-मैन्युफैक्चरिंग सुविधाओं को जोड़कर साझा अनुसंधान इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने पर बल दिया, साथ ही प्रक्रिया विकास, स्केल-अप और रिप्रॉड्यूसिबल टेस्टिंग में सुधार की बात कही। इस सत्र में अंतर-विषय शिक्षा और व्यावहारिक प्रशिक्षण के माध्यम से इंजीनियरिंग बायोलॉजी में एक कुशल कार्यबल तैयार करने का भी आह्वान किया गया। इसके अलावा, जैव प्रौद्योगिकी समाधानों की स्केलेबिलिटी, अफोर्डेबिलिटी और औद्योगिक स्वीकार्यता में सुधार के लिए स्पष्ट रूप से निर्धारित लक्ष्यों के साथ शिक्षा जगत और उद्योग के बीच मजबूत साझेदारी पर जोर दिया गया। चर्चाओं में स्वास्थ्य सेवा, कृषि, ऊर्जा और पर्यावरण के क्षेत्रों में चुनौतियों से निपटने के लिए जैव प्रौद्योगिकी की अपार संभावनाओं को भी रेखांकित किया गया।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव ने ऑटोनॉमस सिस्टम्स, फिजिकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स पर आयोजित सत्र के निष्कर्षों की रूपरेखा प्रस्तुत की। सिफारिशें मुख्य रूप से नेशनल मिशन ऑन इंटरडिसिप्लिनरी साइबर-फिजिकल सिस्टम्स के तहत स्थापित 25 प्रौद्योगिकी हब को मजबूत करने पर केंद्रित थीं, विशेष रूप से जनवरी 2028 से शुरू होने वाले मिशन के अगले चरण की तैयारियों के संदर्भ में। इस सत्र में शोधकर्ताओं और उद्योग को जोड़ने वाले मजबूत टेस्टबेड्स के निर्माण, भारत-विशिष्ट डेटासेट विकसित करने और शैक्षणिक संस्थानों, स्टार्ट-अप्स तथा औद्योगिक साझेदारों के बीच अधिक निकट सहयोग का आह्वान किया गया। इसमें स्वदेशी हार्डवेयर के लिए पेशेंट कैपिटल, बहुविषयक व्यावहारिक प्रशिक्षण, सेफ्टी-बाय-डिजाइन के सिद्धांतों, शुरुआती ग्राहक जुड़ाव और वायबल बिजनेस मॉडल्स पर भी बल दिया गया। ड्राफ्ट विजन में 2030 तक पायलट टेक्नोलॉजी के वैलिडेशन, 2035 तक उनके व्यापक उपयोग व विनिर्माण तथा 2047 तक इन प्रौद्योगिकियों में वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता हासिल करने की परिकल्पना की गई है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक ने कृषि-प्रौद्योगिकी, खाद्य प्रणाली और पोषण पर आयोजित सत्र के मुख्य निष्कर्ष प्रस्तुत किए। चर्चाओं में विभिन्न मंत्रालयों, विभागों, अनुसंधान संस्थानों और उद्योग हितधारकों को एक साथ लाते हुए कृषि-खाद्य प्रणाली के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण पर बल दिया गया। प्रतिभागियों ने पौष्टिक और जलवायु-अनुकूल फसलों की किस्मों को विकसित करने के लिए जीन-बैंक संसाधनों की क्षमता का उपयोग करने, जीनोम एडिटिंग जैसे फ्रंटियर साइंसेज के अनुप्रयोग को तेज करने और कृषि व चिकित्सा अनुसंधान के बीच सहयोग को मजबूत करने का आह्वान किया। इस सत्र में उचित नियामक ढांचे (विशेष रूप से पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के लिए), 'साउथ-साउथ लर्निंग' (विकासशील देशों के बीच आपसी सीख) के माध्यम से बेहतर अंतरराष्ट्रीय सहयोग, और एग्री-फूड वैल्यू चेन में मानव पूंजी के विकास को बढ़ाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया। एक अधिक सतत, किफायती और सुलभ खाद्य एवं पोषण इकोसिस्टम की दिशा में विभिन्न विभागों के योगदान को निर्धारित करने के लिए थ्योरी-ऑफ-चेंज (परिणाम-आधारित बदलाव) दृष्टिकोण का प्रस्ताव रखा गया।
समापन सत्र ने मंत्रालयों, वैज्ञानिक संस्थानों, उद्योग और शिक्षा जगत के बीच समन्वित कार्रवाई के माध्यम से भारत के विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार ईकोसिस्टम को मजबूत करने पर ईएसटीआईसी 2026 के जोर को पुनः रेखांकित किया। उन्नत विनिर्माण, महासागर विज्ञान व समुद्री प्रौद्योगिकियों, जैव प्रौद्योगिकी, स्वायत्त प्रणालियों, रोबोटिक्स, कृषि और पोषण जैसे विषयों में अपनी सिफारिशों के साथ, इस सम्मेलन ने भविष्य के अनुसंधान, तकनीकी विकास और उनके व्यावहारिक अनुप्रयोग के लिए प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान करने का एक मंच प्रदान किया। चर्चाओं ने वैज्ञानिक उत्कृष्टता को औद्योगिक स्वीकार्यता, राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और सामाजिक आवश्यकताओं के साथ जोड़ने की आवश्यकता को भी सुदृढ़ किया।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने वैज्ञानिक वर्ग से आह्वान किया कि वे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रस्तुत किए गए विजन को आगे बढ़ाएं और यह सुनिश्चित करें कि भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियां नागरिकों के लिए ठोस परिणामों में बदलें, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में देश के वैश्विक नेतृत्व को मजबूत करें तथा 'विकसित भारत 2047' के संकल्प को साकार करने में योगदान दें।




